Tuesday, March 4, 2008

हैदराबाद
- डॉ रणजीत

देवी होम्स की छत से देखता हूँ मैं
चारों तरफ चमकती हुई रंगबिरंगी रोशनियाँ
एशिया का सबसे प्रकाशित शहर हैदराबाद
शहर नहीं है जंगल लगता रोशनियों का
विविधवर्णी प्रदीप्त वनस्पतियों का वन
पास की पुरानी बस्ती हफ़ीज़पेट की टेढ़ी मेढ़ी गलियाँ
चमक रहीं हैं सफेद झक्क ट्यूब लाइटों से
दूर एस. आर. टाउनशिप के नीले चमकते निओन नामाक्षर
एक दूसरे में घुलमिल कर
एक विशाल नीले सरौते या इन्डियन मार्का हैण्डपम्प
की तरह दिखाई देते हैं
चारों तरफ चमचमाती हुई वनस्पतियों का वन है
सफेद, पीली, नारंगी, लाल, हरी और नीली रोशनियों
का जंगल
सड़कों की नारंगी सोडियम लाइटें
फ्लाईओवर की ऊँची शुभ्र श्वेत रोशनियाँ
रिले टावरों की लाल बत्तियाँ
साईँ रंगा सिनेमा की क्षण क्षण रंग बदलती लाल नीली रोशनी
और कैलिप्सो होटल की बैंगनी
बीच बीच में निकल जाती है हफ़ीज़पेट स्टेशन से
दीपों की एक चलायमान कतार सी दिपदिपाती एम. एम. टी. एस.
एक के बाद एक खिड़कियों और दरवाज़ों की लयबद्ध दीप्ति शृंखला
इस ट्रेन में पहली बार बैठे थे हम लोग
प्रसाद मल्टीप्लेक्स में थ्रीडी फिल्म ब्लू अर्थ देखने जाने के लिए
फिर तो कई बार बैठे नेक्लेस रोड पर पिकनिक के लिए
शनिवार आते ही बेटी कहती – कहीं आउटिंग का प्रोग्राम
बना लीजिए पापा
बोलिये फिल्म या पिकनिक ?
और बेटा बोलता – दोनो एक ही ट्रिप में नहीं हो सकते क्या ?
क्यों नहीं हो सकते ? मैं कहता
चिकन पुलाव बना ले तुम्हारी मम्मी
बारह से फिल्म देखी जाय
और उसके बाद आ जाएं नेक्लेस रोड पर
पिकनिक के लिए
साफ सुथरी तरोताजा पंखों और ट्यूब लाइटों वाली शानदार
एम. एम. टी. एस. में बैठ कर लगता
इसी में क्यों ना कर लें पिकनिक ?
ढेरों लोग मिलतें हैं नेक्लेस रोड पर शनिवार को
और सिनेमाओं में भी
हुसैन सागर को सोने की जंजीर सी चारों ओर से घेरती हुई
नेक्लेस रोड पर पिकनिक करते हुए लगता है
वाह हैदरबाद शहर क्या है रामणेच्छुओँ का स्वर्ग है
जिसे देखो छुट्टी मना रहा है,
पाँच दिन जी तोड़ परिश्रम के बाद

कोइ शहर अच्छा है या बुरा
यह जानने की सबसे अच्छी कसौटी मेरे खयाल से यही है
कि किसी राह चलते से या पान-चाय वाले से पूछिये
किसी गंतव्य का रास्ता
कितनी परवाह से बताते हैं यहाँ के लोग
फर्स्ट लेफ्ट जाकर सेकंड राइट की लेन पकड़ लीजिये
कोई सौ मीटर चलने पर है विवेक वर्धिनी का पी. जी. कॉलेज
दिल्ली में पूछ कर देखिये
ना जाने कितनों से पूछना पड़े आपको
कोई कितना भटका दे इसका हिसाब नहीं
क्योंकि दिल्ली किसी की नहीं
पर हैदराबाद है हैदराबाद वालों का
थ्री व्हीलर वालों तक को है चिंता इस बात की
कि हैदराबाद आपको कैसा लगा ?
वे कभी कभार ही वसूलते हैं लंबा रास्ता पकड़कर पैसा

हो गई है पहचान अब तक
यहाँ की कुछ साहित्यिक संस्थाओं से
पूर्व निश्चत कर रखी हैं तिथियाँ उन्होंने अपनी बैठकों की
जैसे हर पूर्णिमा की रात कविगोष्ठी होगी
नेहपाल वर्मा जी की 'गीत चाँदनी' की
और गिनते रहते हैं वो अपनी गोष्ठियों की संख्या
अख़बार में छ्पेगा 'गोलकोंडा दर्पण के तिरासीवें अंक का लोकार्पण
कल संपन्न हुआ'.
शायद यह देश की इकलौती पत्रिका है जो
अपने हर अंक का लोकार्पण आयोजित करती है
उपेन्द्र जी का हिन्दी लेखक संघ अपनी गोष्ठियाँ करता है
हर महीने के दूसरे शनिवार को
डॉ़ अहिल्या मिश्रा का कादम्बिनी क्लब
तीसरे रविवार को
और पहला शनिवार सुरक्षित है
मुरलीधर शर्मा जी के
साहित्य संगम इंटरनेशनल की
सबरंग गोष्ठियों के लिए
उपस्थिति घटती बढती रहती है
पर सभी संस्थाओं की गोष्ठियाँ नियमित होती रहती हैं
अपने अपने निर्धारित दिनों में, निश्चत स्थानों और निश्चत समय पर
ऐसी जिम्मेदार साहित्यिक सक्रियता मैंने हैदराबाद में ही देखी
मेरी“परिवर्तन कि पुकार”पर समीक्षा गोष्ठी रखी थी कदिम्बिनी क्लब ने
लक्ष्मी नारायण अग्रवाल और प्रो. धर्मपाल पीहल ने
समीक्षा आलेख प्रस्तुत किए
ऐसी ही किसी गोष्ठी में परिचय के बाद
सिकंदराबाद पी. जी. कॉलेज के अध्यक्ष प्रो. व्यास जी ने
बुलाया था मुझे प्रगतिशील कविता पर व्याख्यान देने
और काव्य पाठ के लिए
अध्यापक के साथ ही पर्यावरण रक्षाकर्मी भी हैं वे
और इसी सरोकार पर लिखते हैं कविताएँ भी.
अच्छे खासे कवि हैं दक्षिण भारत हिन्दी प्रचार सभा के
उच्च शिक्षा व शोध विभाग के अध्यक्ष
प्रोफेसर ऋषभ देव शर्मा भी
किसम किसम के आन्दोलनों में से एक
तेवरी के प्रणेता
और व्याख्याता तो ग़जब के
लच्छेदार परिनिष्ठित हिन्दी निकलती है लगातार
उनके श्रीमुख से
उन्होने भी बुलाया काव्य पाठ के लिए
और फिर त्रिलोचन पर संगोष्ठी की अध्यक्षता के लिए भी
कविता और व्याख्यान सुनकर उनकी एक छात्रा वंदना बोली
सर आपको महीने में एक बार तो यहाँ आना ही चाहिए
मैंने कहा: अपने प्रोफेसर साहब से कहो बुला लिया करें
हफ़ीज़पेट से सीधी एम. एम. टी. एस. है आपके खैरताबाद तक
मुझे आने में कोई कष्ट नहीं है.

“जी हाँ”की जगह “जियो” सुनकर
बड़ा भला लगता है नेहपाल वर्मा जी के मुख से
“नक्को”,“लोगाँ”और“मकानाँ”भी हैं
दकनी के रूप जो सहज ही निकलते हैं
यहाँ के हिन्दी भाषियों के मुंह से
वर्मा जी पुख्ता जानकार हैं हैदराबाद के
इतिहास और भूगोल और संस्कृति के
क्षेत्र-क्षेत्र में करते हैं गीत चाँदिनी की गोष्ठियाँ
सबसे पहले पहुँच कर व्यवस्था करती हैं रत्नकला मिश्रा
और उस स्थान के इतिहास पर लम्बी टिप्पणियाँ करते हैं वर्मा जी
नौसिखिये कवियों की साधारण कविताओं की भी करते हैं प्रशंसा
वरिष्ठ कवि कोफ्त खा जाते हैं कई बार
एक ने मेरे कान में धीरे से कहा -
दो घंटे गोष्ठी चले तो एक घंटा तो
चाहिए वर्मा जी की संचालाकीय टिप्पणियों के लिए
और शेष एक घंटे में निपट जाती हैं सबकी कविताएं
हर साहित्यिक गोष्ठी के समाचार छपते हैं
“स्वतंत्र वार्ता”और“मिलाप”में दो बार
एक दिन पहले पूर्व सूचना के रूप में कि
गोलकोंडा दर्पण के अमुक अंक का लोकार्पण कल होगा
उसमें यह सूचना तो रहती ही है कि कौन करेगा लोकार्पण
और कौन अध्यक्षता
पर साथ ही यह भी कि इसकी तैयारी के लिए फलाँ फलाँ सज्जनों
कि एक बैठक हुई और उसमें फलाँ फलाँ की सदस्यता वाली एक
व्यवस्था समिति बनाई गई है
फिर समाचार छपता है गोष्ठी संपन्न होने के बाद.
पर इस तरह लिखने लगा यहाँ के हाल चाल
तो कविता बढती ही जायेगी द्रोपदी के चीर की तरह
इसलिए अब उसे खत्म करता हूँ.
शेष फिर कभी.

A-004, आदर्श विहार
5/1, बनरघट्टा रोड
बंगलोर - 29



















1 comment: