Tuesday, March 13, 2007

पुस्तकों के प्रति

किन शब्दों में तुम्हारा शुक्रिया अदा करूं , मेरी किताबो
की ज़माने की कटुताएं और ह्रदय की कुंठाएँ
मैं तुम्हारे पृष्ठों की पवित्र गंगा में बहा देता हूँ
और हल्का हो जाता हूँ
तुमने मेरे दिनों को उजाला दिया है, मेरी पुस्तकों !
कि वे सब चीज़ें जो दिन के उजाले में नही देखी जा सकतीं
तुम्हारे उजाले ने मुझे दिखाई हैं !
तुमने मेरे असन्तोष को सन्दर्भ दिया है
मेरे संघर्ष को परिप्रेक्ष्य दिया है
मेरे विद्रोह को इतिहास दिया है
मेरी थकी थकी दिनचर्या की तल्खियों से भरी शामों को
अरब के रेगिस्तान, लेबनान की फलों लदी घाटियाँ
और तुर्की के बंदरगाह दिये हैं
अमेरिका के खेतों के फ़ैलाव
और रूस की खानों की गहराइयाँ दी हैं
तुमने मेरी रातों के सपनों को व्यापकता दी है, मेरी किताबो !
उन्हें रोटी-रोज़ी, परिवार
और नारी-शरीरों की परिधि से बाहर निकला है
तुम मेरे क्रूर परिवेश की कारा में बनी हुई वे खिड़कियाँ हो
कि जिनसे
बेहतर ज़िंदगी और आशा और विश्वास की ताज़ा हवा
मुझ तक पहुँचती है
तुम वे द्रवण-नलियाँ हो, मेरी पुस्तकों !
जिनसे तुम्हारे महान लेखकों की आत्माएं वाष्पीभूत होकर
मेरी आत्मा के शुद्ध पात्र में द्रवित हो जाती हैं
और मैं उनकी सुगंध से परिपूर्ण हो उठता हूँ




दुनिया : एक वेइंग मशीन

यह दुनिया
एक लंबी चौड़ी वेइंग मशीन है
इसके प्लेटफॉ़र्म पर जब आप खड़े होते हैं
इसका लाल और सफ़ेद चित्तियोंवाला चक्का तो घूम जाता है
पर आपका वज़न आंकने वाला टिकट
यह तब तक इशू नहीं करती
जब तक कि आप इसके मुंह में पैसा ना डालें



अभिशप्त आग

कितने सुखी हैं वे --
सुखी और सन्तुष्ट
जो हर रोज़ अपने मालिकों के लिए मेहनत करते हैं
और उसे फ़र्ज़ कहते हैं,
और वे , जो हर सांझ किसी पत्थर या पोथी के सामने नाक रगड़ते हैं
और उसे धर्म कहते हैं,
और वे, जो हर रात किसी औरत के साथ सोकर गुज़ारते हैं
और उसे प्यार कहते हैं,
और वे, जो हर बार अपनी सरकारों के लिए शस्त्र उठाते हैं
और उसे देशभक्ति कहते हैं

लेकिन मैं ?
उफ़ ! मेरे भीतर ये कौन सी अभिशप्त आग जल रही है




एक द्वंद्वात्मक स्थति

वाद प्रतिवाद
दर्द बड़ा है
गीत हैं ओछे
पूरा दर्द नही कह पाते;
प्यार बड़ा है मीत हैं ओछे
पूरा प्यार नहीं सह पाते !
संवाद
दर्द कितना भी बड़ा हो
व्यर्थ है उसका बड़प्पन
जब तलक वह गीत में आता नहीं है
गीत कितना भी सुघड़ हो
व्यर्थ है उसकी सुघड़ता
जब तलक वह दर्द को पाता नहीं है !
प्यार कितना भी खरा हो
व्यर्थ है उसका खरापन
जब तलक वह मीत को भाता नहीं है
मीत कितना भी सुभग हो
व्यर्थ है उसकी सुभगता
जब तलक वह वह प्यार कर पाता नहीं है!

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